
नवरात्री महत्व, कलश स्थापना ...
नवरात्री महत्व, कलश स्थापना एवं पूजा विधि (सम्पूर्ण जानकारी)
भारतीय संस्कृति वेद और पुराणों के समन्वय और वैज्ञानिकता के आधार पर शक्ति संचय के विधान से बना है। पृथ्वी द्वारा सूर्य की परिक्रमा करते हुए चार संधियों से गुजारना पड़ता है। इन संधियों में पृथ्वी पर प्रकृति में बहुत बड़ा बदलाव होता है। जो जनमानस जनजीवन को आघात पहुंचा सकता है। इन दिनों रोगाणुओं के आक्रमण की संभावना प्रबल होती है। इन सब को सकारात्मकता से भरपूर करने के लिए स्वास्थ्य और शक्ति से संपन्न होने के लिए हर संधि काल को हमारे महाऋषियों ने चार नवरात्र में बाँटा है |इस प्रकार नवरात्र वर्ष में चार बार मनाया जाता है | इन दिनों रात में प्रकृति के बहुत सारे अवरोध खत्म हो जाते हैं इसलिए रात्रि पूजा ,साधना का महत्व विशेष है और इसलिए इन्हें नवरात्रि कहा जाता है।नवरात्रों के पहले सात दिनों में हम अपने 7 चक्रों की जागृति, आठवें दिन अपनी शक्ति की जागृति और नौवें दिन सिद्धि की प्राप्ति करते है।
नवरात्र मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं | पहला प्रकट नवरात्र और दूसरा गुप्त नवरात्र | प्रकट नवरात्र वर्ष में दो बार मनाया जाता है, पहला चैत्र माह में जिसे चैत्र नवरात्र या वासंतीय नवरात्र भी कहते है वही दूसरा नवरात्र अश्विन माह में आता है जिसे अश्विन नवरात्र या शारदीय नवरात्र कहते है | गुप्त नवरात्र भी साल में दो बार आता है पहला आषाढ़ माह में और दूसरा माघ माह में |
प्रकट नवरात्रों में नव दुर्गा की आराधना की जाती है वहीं गुप्त नवरात्रों में दस महाविद्या की पूजा अराधना और सिद्धि की जाती है | आज हम आपको चैत्र नवरात्रि और अश्विन नवरात्री की सम्पूर्ण पूजा विधि विस्तार पूर्वक बताने जा रहे हैं | नवरात्र पूजा एवं कलश स्थापना विधि, मंत्र एवं पूजा सामग्री लिस्ट ? किस दिन माँ के किस रूप की आराधना की जाती है एवं किस दिन माँ को प्रसाद रूप में क्या अर्पित करें ?
नवरात्र कलश स्थापना एवं पूजन विधि :-
सर्वप्रथम इस बात को ध्यान में रखें की माँ को पूर्ण समर्पण और भक्ति भावना ही प्रिये है | व्रत, पूजा, मंत्रो का जप आदि अपने समर्थ और क्षमता अनुसार ही करें | इसी तथ्य को मन में धारण करते हुए कलश स्थापन करें। सारी सामग्री पहले से ही एकत्रित कर लें। पूजा स्थल निश्चित कर के साफ-सफाई कर लकड़ी की चौकी पर लाल वस्त्र बिछा दे, उस पर मां नव दुर्गा की मूर्ति या तस्वीर रखें। अब उस चौकी के नीचे ईशान कोण में शुद्ध मिट्टी का मोटा गोलाकार पिंड बनाए जिस के बीच में कलश स्थापित किया जा सके।अब भींगे हुए जौ के बीज मिट्टी में हलके हाथों से मिला दें और कलश पर रोली से स्वस्तिक बनाए।अगर कलश स्थापना ब्राह्मण देव करा रहें हैं तो मंत्र के साथ विधि भी बताएंगे परन्तु अगर आप स्वयं कलश स्थापना कर रहें है तो माँ का ध्यान एवं नवार्ण मन्त्र "ऊँ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै" का जप करते हुए कलश स्थापना के सारे विधान संपन्न करें। कलश को लाल रंग के वस्त्र से लपेट कर मौली से बांधे, उसमें थोड़ा गंगाजल डाले फिर सुपारी, पुष्प ,इत्र, चंदन , सर्वोषधी, नव रत्न, एक या पाँच रुपय का सिक्का आदि डाले फिर इन्हे मिट्टी पर स्थापित करें अब इसमें शुद्ध जल डाले फिर पाँच पल्लव डाल कर मिट्टी के ढक्कन से ढक दें। इस ढक्कन को चावल से भर दें । अब पानीवाला नारियल धो कर चुनरी से लपेट दें, मौली से बांध कर सुरक्षित कर लें फिर ढक्कन के चावल के बीचोबीच स्थापित करें। कलश में माला, फूल अर्पित करें और धुप,दीप, प्रशाद अर्पित करें | वरुण देव, समुंद्र देव, ब्रह्मा, विष्णु, महेश का पूजन भी कलश पर ही उनका ध्यान करते हुए करें | अब कलश के सामने पाँच मिट्टी के छोटे दक्कन रखें और इन ढक्कनों में चावल भर कर सभी में एक-एक सुपारी मौली से लपेट कर स्थापित करें | ये सुपारी पांच देवी-देवताओं के प्रतिरूप के रूप में स्थापित किये जाते है | इन दक्कानो में क्रमशः गौरी - गणेश, नौ ग्रह, षोडश मातृका, दिकपाल एवं क्षेत्रपाल की स्थापना करें |
अब अग्र लिखित सभी देवताओं का आवाहन एवं पूजन करें। अब मां नवदुर्गा की पूजा विधिवत् करें ।श्रृंगार प्रसाधन, वस्त्र आभूषण से मां को सजाएं, इत्र ,पुष्पमाला अर्पित करें। एक शुद्ध घी का दीपक और एक तिल के तेल का दीपक तैयार करे इसे चावल के वेदी पर कलश के बगल में स्थापित करें। आप आखंड दीप भी जला सकते है।
अब माँ को भोग और फल समर्पित करें फिर पान, सुपारी, लौंग, इलाइची समर्पित करें । इस प्रकार कलश स्थापना और पूजन कर नवरात्री व्रत का संकल्प लें और अपनी मनोकामना माँ से कहें, तत्पश्चात नवार्ण मंत्र का जप, दुर्गा सप्तशती का पाठ आदि करें | अंत में आरती कर क्षमा प्रार्थना करना ना भूलें |
नौ दिनों के नौ भोग :-
नवरात्रों के नौ दिनों में माँ के विभिन्न स्वरूपों को विभिन्न प्रकार के भोग समर्पित करने का नियम बताया गया है। मां के प्रत्येक स्वरूप की साधना, मंत्र जप का भी विधान है ।आप अपनी सुविधानुसार कर सकते है । फलफूल मिष्ठान के आलावे प्रत्येक दिन के विशेष भोग का विधान निम्न है :
1. प्रथम दिन माँ शैलपुत्री की विशेष पूजा की जाती है | माँ शैलपुत्री को गाय के घी का भोग लगाए। फिर सप्तशती पाठ या मंत्र जाप करें। घी का दान भी करें। इस तरह आरोग्य की प्राप्ति होती है । शाम को पुनः भोग एवं आरती करें।
2. दूसरे दिन माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा करें और अन्य प्रसाद के साथ मां ब्रह्मचारिणी को शक्कर का भोग लगाए । इससे इंसान दीर्घायु को प्राप्त करता है । शक्कर दान भी करें।
3. तीसरे दिन माँ चंद्रघंटा की पूजा कर माँ को दूध से बनी खीर या मिठाई का भोग लगाते है।जिससे हमें संपूर्ण दुखो से मुक्ति मिलती है, और परमानन्द की प्राप्ति होती है।
4. चौथे दिन माँ कुष्मांडा की विशेष पूजा की जाती है। पूजा के बाद कुष्मांडा मां को मालपुआ का भोग लगाते है। इससे शुभबुद्धि और निर्णायक शक्ति का विकास होता है।
5. पांचवा दिन माँ स्कंदमाता को समर्पित होता है, आज स्कंदमाता की विधिवत पूजा अर्चना की जाती है | मां स्कंदमाता को केले का भोग लगाना अतिउत्तम माना जाता है। इससे निरोगी काया की प्राप्ति होती है।
6. छठे दिन माँ कात्यायनी की विशेष पूजा कर के शहद और पान के पत्ते का भोग लगाते है । इससे समाज परिवार में लोक प्रियता बढ़ती है।
7. सातवें दिन माँ काल रात्रि की विशेष पूजा करते है, और मां को गुड़ का भोग लगाते है।इससे अचानक आपदा विपदा से सुरक्षा मिलती है, फिर संध्या आरती, पूजन एवं दान करें।
8.आठवें दिन माँ महागौरी की पूजा का विधान है। नवदुर्गा पूजा के बाद मां महा गौरी को नारियल का भोग लगाए। इससे मां प्रसन्न हो कर मनोवांछित आशीष देती है। फिर संध्या पूजा आरती करें।
9. नौमी के दिन माँ सिद्धिदात्री की विशेष पूजा होती है। यह दिन नौ दिनों तक की गयी पूजा और जप के सिद्धि का दिन होता है |आज मां को तिल का भोग लगाते है इससे मृत्युभय और अनहोनी से रक्षा मिलती है।हमारे संकल्प की सिद्धि होती है। नवमी के दिन हवन तथा कन्या पूजन का विधान है | कई जगहों पर कन्या पूजन एवं हवन अष्टमी तिथि को किया जाता है |
हवन करने के लिए हवन वेदी पर रोली से स्वस्तिक बना कर हवन कुण्ड की पूजा करें फिर अग्नि देव का आवाहन कर पूजन करें । फिर हवन सामग्री से नव ग्रहों एवं गणेश भगवान को आहुति दें फिर मां के नवार्ण मन्त्र " ऊँ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै" से 108 आहुतियां दे कर संकल्पित मंत्रो का दशांश हवन करें या फिर सप्तशती के सारे मंत्रो से हवन का विधान है, अपने वास्तुदेव, कुलदेवी ,इष्टदेव देवी का भी हवन करें। फिर हवन भभूत सब को लगाएं ,आरती ,क्षमा प्रार्थना करे फिर विसर्जन, प्रसाद वितरण कर दान करें फिर पारण करें।
|| जय मां दुर्गे ||
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